Thursday, January 09, 2014

Astrological remedies : Traditional has more powerful tools

1/09/2014 06:50:00 PM

वैदिक उपचार अधिक कारगर

हम क्विक फिक्‍स के जमाने में जी रहे हैं, जहां हमें हमारी अधिकांश समस्‍याओं का समाधान हमें तुरंत चाहिए। भले ही समस्‍या हमने खुद पैदा की हो या हमारी भाग्‍य के कारण आ रही हो, समस्‍या के अंतिम क्षणों में ज्‍योतिषी याद आता है और तुरंत समस्‍या का समाधान प्राप्‍त करने की कोशिश की जाती रही है। 

पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष में ऐसा कोई विचार नहीं है कि आपको वर्तमान में‍ किसी समस्‍या का सामना करना पड़े और तत्‍काल उस समस्‍या का समाधान कर दिया जाए। हां तंत्र में कुछ ऐसी पद्धतियां हैं, लेकिन उनकी साधना करने वाले आसानी से उपलब्‍ध नहीं होते। जो दावा करते हैं, वे भी अधिकांशत: जनता को बरगलाने वाले ही दिखाई दिए हैं। 

लाल किताब ने जनता की इस मांग को बखूबी समझा और लग्‍न कुण्‍डली या जातक कुण्‍डली की बात छोडि़ए वर्षफल कुण्‍डली तक के उपचार निकाल दिए। इसमें भी ऐसे उपचार शामिल किए गए हैं जो आम जातक तुरत फुरत कर सकता है। इसके इतर प्राचीन ज्‍योतिष में केवल कुण्‍डली में खराब ग्रहों के उपचार और कुण्‍डली के कार्यकारी या कहें अनुकूल परिणाम देने वाले ग्रहों को बल देने तक ही बात की गई है। 

ऐसे में हमें ज्‍योतिष में रहते हुए भी तंत्र के एक भाग पौष्टिक मंत्र एवं यंत्र का सहारा लेना पड़ता है। पौष्टिक तंत्र का सबसे सफल उदाहरण हमें मिलता है श्रीयंत्र में। श्री का अर्थ है लक्ष्‍मी। अर्थ युग में लक्ष्‍मी ही हमें अधिकांश समस्‍याओं का समाधान दे देती है। ऐसे में पिछले कुछ दशकों में श्री विद्या पर जितना काम हुआ है, उतना किसी दूसरी विधा पर हुआ दिखाई नहीं देता है। 

अब श्रीयंत्र का उपयोग और इसके परिणाम ठोस होने के बावजूद परिणाम तुरंत नहीं आते हैं। श्रीयंत्र को वास्‍तु के अनुसार घर या फैक्‍ट्री में लगा भी दिया जाए, तो यह एक अच्‍छा खासा समय लेता है अपने परिणाम देने में। ऐसे में लोग इंतजार नहीं कर पाते हैं। 

यहां चित्र में दर्शाया गया श्रीयंत्र आदि शंकराचार्य की सौंदर्य लहरी पर आधारित है। नरेशचंद्र मिश्र के इस लेख में आपको सौंदर्य लहरी की कथा मिल जाएगी। 

इसके अलावा भारत कोश में यहां भी आपको अतिरिक्‍त जानकारी मिल जाएगी। सौंदर्य लहरी में बताए श्‍लोकों के अनुसार शिव और शक्ति के स्‍वरूप फलक और चषक को मिलाकर श्रीयंत्र का निर्माण किया गया है। इसकी आराधना तो और भी मु‍श्किल है, लेकिन केवल बाजार से लाकर श्रीयंत्र ही घर के दक्षिणी पश्चिमी कोने में किसी शुद्ध स्‍थान पर लगाया जाए तो इसके बेहतरीन परिणाम देखने को मिलते हैं।

जो तस्‍वीर यहां दर्शाई गई है, इस श्रीयंत्र को दशद्वार के साथ मेरे गुरुजी ने बनाया है। इसकी खासियत यह है कि ऑटोकैड में बने इस श्रीयंत्र में एक दूसरे को कोण पर काटते हुए त्रिभुज नहीं मिलेंगे।  इसे प्राप्‍त करना कुछ मुश्किल है। अगर आप श्रीयंत्र का प्रयोग करना चाहें तो बाजार में मिल रहे किसी भी श्रीयंत्र को लाकर घर में लगा सकते हैं। 

इसी प्रकार है महालक्ष्‍मी साधना। आदि गुरु शंकराचार्य ने ही कनकधारा स्रोत के रूप में इसकी रचना की थी। इंटरनेट पर आपको कई जगहों पर यह स्रोत और इसका अनुवाद मिल जाएगा। न तो मैंने इसे रचा है न ही इसका अनुवाद किया है। यहीं इंटरनेट से उठाकर इन्‍हें कंपाइल किया है। अब तक जितने भी कनकधारा स्रोत सुने हैं, उनमें सर्वश्रेष्‍ठ मुझे एमएस सुब्‍बलक्ष्‍मी का गाया कनकधारा स्रोत ही लगा है। आप भी सुनिए... 


श्री कनकधारा स्तोत्रम्

अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:

* जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल-तरु का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो प्रकाश श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का वह कटाक्ष मेरे लिए मंगलदायी हो।

मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:

जैसे भ्रमरी महान कमल दल पर मँडराती रहती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है। लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन संपत्ति प्रदान करे।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:

जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मधुहन्ता श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनंद प्रदान करने वाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर थोड़ी सी अवश्य पड़े।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:

शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों, जिनकी पु‍तली तथा बरौनियाँ अनंग के वशीभूत हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष (अपलक) नयनों से देखने वाले आनंदकंद श्री मुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं।

बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरि‍नीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:

जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मंडित वक्षस्थल में इंद्रनीलमयी हारावली-सी सुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:

जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के श्यामसुंदर वक्षस्थल पर प्रकाशित होती है, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।

प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:

समुद्र कन्या कमला की वह मंद, अलस, मंथर और अर्धोन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहाँ मुझ पर पड़े।

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:

भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी धाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करे।

इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:

विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, पद्‍मासना पद्‍मा की वह विकसित कमल-गर्भ के समान कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करे।

गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै ‍नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै।

जो सृष्टि लीला के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में विराजमान होती है तथा प्रलय लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में अवस्थित होती है, त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्य यौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है।

श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।

मात:। शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों की सिंधु रूपा रति के रूप में आपको नमस्कार है। कमल वन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुष्टि रूपा पुरुषोत्तम प्रिया को नमस्कार है।

नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।

कमल वदना कमला को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है। चंद्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है।

सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।

कमल सदृश नेत्रों वाली माननीय माँ! आपके चरणों में किए गए प्रणाम संपत्ति प्रदान करने वाले, संपूर्ण इंद्रियों को आनंद देने वाले, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत हैं, वे सदा मुझे अवलम्बन दें।

यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।

जिनके कृपा कटाक्ष के लिए की गई उपासना उपासक के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूँ।

सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।

भगवती हरिप्रिया! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, तुम्हारे हाथों में नीला कमल सुशोभित है। तुम अत्यंत उज्ज्वल वस्त्र, गंध और माला आदि से सुशोभित हो। तुम्हारी झाँकी बड़ी मनोरम है। त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।

दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।

दिग्गजों द्वारा सुवर्ण-कलश के मुख से गिराए गए आकाश गंगा के निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्री अंगों का अभिषेक (स्नान) संपादित होता है, संपूर्ण लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रात:काल प्रणाम करता हूँ।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया :।

कमल नयन केशव की कमनीय कामिनी कमले! मैं अकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूँ, अतएव तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूँ। तुम उमड़ती हुई करुणा की बाढ़ की तरह तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी ओर देखो।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्। 
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।

जो मनुष्य इन स्तु‍तियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा त्रिभुवन-जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।


धन के बारे में यह सीरीज आगे भी जारी रहेगी। 
अगली कड़ी में कुबेर मंत्र, चौबीसा यंत्र और पंद्रहिया यंत्र 
जिसे कि जय यंत्र भी कहा गया है, के बारे में चर्चा करेंगे।

Written by

Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is Professional astrologer. In this blog you will find more than 200 astrology articles. We try to touch almost every branch of astrology. Like vedic, hindu, horoscope, lal kitab, ratna, sunhari kitab, KP, Prashna, Jem stone etc.Hope you will find it useful. Mobile 09413156400

1 विचारों का प्रवाह:

  1. आपका बहुत—बहुत धन्यवाद!

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