कलियुग का 5114वां वर्ष

सृष्टि शुरू होने से अब तक सत, त्रेता और द्वापर युग बीत चुके हैं। अब चार लाख बत्‍तीस हजार साल का कलियुग चल रहा है। आने वाली 11 अप्रेल 2013 यानी विक्रम संवत् 2070 के शुभारंभ में हम कलियुग के 5114वें वर्ष में जी रहे होंगे। ब्रह्मपुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरंभ चैत्र शुक्‍ल प्रतिपदा को किया था। इस बार चैत्र शुक्‍ल प्रतिपदा के दिन पराभव नाम का संवत्‍सर शुरू होगा। यह दिन नैसर्गिक रूप से सिद्ध मुहूर्त है। इसी कारण नवसंवत्‍सर के पहले दिन दान, पूजा और धार्मिक कृत्‍यों का विशेष महत्‍व है। इस वर्ष तीन ग्रहण होंगे। नौ मई की रात को कंकण सूर्यग्रहण, तीन नवम्‍बर को दोपहर में खग्रास सूर्यग्रहण और 25 अप्रेल की रात को खण्‍डग्रास चंद्र ग्रहण।

विक्रम संवत्‍ 2070, 11 अप्रेल 2013 से 30 मार्च 2014 तक चलेगा। इस बीच शनिदेव तुला राशि में ही भ्रमण करेंगे। पिछले दिनों 18 फरवरी को शनि वक्री हो चुके हैं। यह वक्रता 7 जुलाई तक जारी रहेगी। इसके बाद 8 जुलाई से 3 मार्च 2014 तक मार्गी रहने के बाद एक बार फिर वक्री हो जाएंगे। इस दौरान कन्‍या, तुला और वृश्चिक राशि वाले जातकों को शनि की साढ़ेसाती के शुभ और अशुभ फल मिलेंगे। कर्क और मीन राशि के जातकों को शनि की ढैय्या के अशुभ प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं। कर्क, कन्‍या, तुला, वृश्चिक और मीन राशि के जातकों को शनि संबंधी पीड़ा होने पर बीजमंत्र ‘ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:।।’ का जाप करना चाहिए। इससे शनि की पीड़ा कम होगी।

संवत्‍सर शुरू होने के समय गुरु का भ्रमण वृष राशि में चल रहा है। गुरु महाराज 30 मई 2013 तक वृष राशि में रहेंगे, इसके बाद 31 मई को मिथुन राशि में प्रवेश कर जाएंगे। संवत् समाप्ति तक गुरु इसी राशि में रहेंगे। मिथुन राशि में संचरण के दौरान 7 नवम्‍बर को वक्री होंगे और 6 मार्च 2014 को पुन: मार्गी होंगे। जिन राशियों से गुरु तीसरे, चौथे, छठे, आठवें और बारहवें स्‍थान पर होंगे, उन राशियों को अपेक्षाकृत खराब फल मिल सकते हैं। इन जातकों को गुरु के बीज मंत्र ‘ऊं ग्रां ग्रीं गौं स: गुरुवे नम:’ का जाप करना चाहिए। राहू पूरे साल तुला राशि में और केतू मेष राशि में रहेंगे।

बारह संक्रांतियों को देखा जाए तो इस वर्ष वैशाख संक्रांति 13 अप्रेल को शनिवार के दिन होगी। इसका प्रभाव अशुभ बताया गया है। ज्‍येष्‍ठ संक्रांति 14 मई को मंगलवार को दिन होगी। सत्‍ता पक्ष के लिए यह कठिन समय होगा। आषाढ़ संक्रांति 14 जून शुक्रवार को होगी। इस माह गुरु अतिचारी और शनि वक्री होने से खराब परिणाम मिलेंगे। श्रावण संक्रांति 16 जुलाई मंगलवार को होगी, इस माह शिव पूजा का विशेष महत्‍व है। भाद्रपद संक्रांति 16 अगस्‍त शुक्रवार को होगी। वार के अनुसार मिश्रा और नक्षत्र के अनुसार राक्षसी नामक संक्रांति को पशुपालकों के लिए लाभदायक बताया गया है। आश्विन संक्रांति 16 सितम्‍बर सोमवार को होगी। इस माह श्राद्ध पक्ष में गंगास्‍नान और जप-तप का विशेष महत्‍व रहेगा। कार्तिक संक्रांति 17 अक्‍टूबर गुरुवार को होगी। कलियुग में इसे सर्वश्रेष्‍ठ मास बताया गया है। मार्गशीर्ष संक्रांति 16 नवम्‍बर शनिवार को शुरू होगी। कार्तिक पूर्णिमा के दिन पद्मक योग बन रहा है। इस दिन तीर्थ स्‍नान का विशेष महत्‍व है। पौष संक्रांति 15 दिसम्‍बर रविवार को शुरू होगी। माघ संक्रांति 14 जनवरी 2014 मंगलवार को शुरू होगी। इस माह अनाजों में तेजी और सत्‍ता में टकराव की स्थिति बनेगी। फाल्‍गुन संक्रांति 12 फरवरी बुधवार को शुरू होगी। इस माह महाशिवरात्रि में शिव आराधना का विशेष महत्‍व रहेगा। चैत्र संक्रांति 14 मार्च शुक्रवार को होगी।

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महिलाएं और ज्‍योतिष

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फलित ज्‍योतिष का विकास कुछ इस तरह हुआ कि पहले ज्‍योतिषी दरबारी हुए और बाद में व्‍यवसायियों के हित में काम होने लगा। पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों से संबंधित फलित ज्‍योतिष के बिंदू उपेक्षित होते गए। इक्‍कीसवीं सदी में महिलाओं की भूमिका बढ़ने के साथ ही ज्‍योतिष में भी स्‍त्री जातकों पर फिर से काम होने लगा है। हालांकि कई पुस्‍तकें यह भी दावा करती हैं कि पुरुष को संबोधित कर बताए गए योगायोग स्त्रियों पर भी उसी प्रकार लागू होते हैं, लेकिन कई जगह बताया गया है कि बुध और शनि जैसे ग्रहों का व्‍यवहार स्‍त्री जातकों के मामले में बदल जाता है। आइए देखते हैं दैनिक जीवन में ज्‍योतिष स्त्रियों की मदद किस प्रकार कर पाता है।

ग्रहों और राशियों को भी स्‍त्री और पुरुष वर्गों में बांटा गया है। मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ को पुरुष राशि और वृष, कर्क, कन्‍या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों को स्‍त्री राशि कहा गया है। इसी प्रकार चंद्रमा और शुक्र जहां स्‍त्री स्‍वभाव ग्रह है वहीं सूर्य, मंगल और गुरु पुरुष ग्रह हैं। स्‍त्री जातकों में स्‍त्री राशि और स्‍त्री ग्रहों का प्रभाव अधिक होने पर स्‍त्रैण गुण अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होंगे। ऐसा देखा गया कि जिन मामलों में पुरुष जातकों की तुलना में स्‍त्री जातकों का विश्‍लेषण किया जाता है, उनमें स्‍त्री जातकों के लिए अलग नियम दिए गए हैं। शेष योगायोगों के मामले में स्‍त्री और पुरुष जातकों को कमोबेश एक ही प्रकार से फलादेश दिए जाते हैं। जिस स्‍त्री की कुण्‍डली में पुरुष राशियों और पुरुष ग्रहों की भूमिका अधिक होती है, उनका जीवन में कमोबेश पुरुषों की तरह होता है। भारी आवाज, बड़े डील-डौल, उत्‍साह के साथ आगे बढ़कर काम करने वाली महिलाओं को देखकर ही समझा जा सकता है कि उनकी कुण्‍डली में पुरुष राशियों और सूर्य, मंगल और गुरु जैसे ग्रहों का प्रभाव अधिक है।

वृहस्‍पति

पुरुष कुण्‍डली में जहां शुक्र सांसारिकता और दैहिक सुख के लिए देखा जाता है वहीं स्‍त्री जातक के लिए गुरु महत्‍वपूर्ण है। स्‍त्री जातक के लिए उसके पति का प्रगति करना सौभाग्‍य का प्रतीक माना जाता है। जिस स्‍त्री जातक की कुण्‍डली में वृहस्‍पति शुभ स्‍थान और शुभ प्रभाव में होता है, उसे सामाजिक मान प्रतिष्‍ठा और सांसारिक सुख सहजता से मिलते हैं। वृहस्‍पति खराब होने पर स्‍त्री जातक को अपमान और उपेक्षा झेलनी पड़ सकती है। ऐसे में अधिकांश स्‍त्री जातकों को गुरु का रत्‍न पुखराज पहनने की सलाह दी जाती है। पुखराज रत्‍न सोने की अंगूठी में पहनने से गुरु का प्रभाव बढ़ जाता है। जिन जातकों के गुरु मारक अथवा बाधकस्‍थानाधिपति होता है, उनके अलावा सभी स्‍त्री जातकों को बेधड़क पुखराज पहनाया जा सकता है।

मंगल का रोल

सामान्‍य तौर पर ऋतुस्राव के दौरान स्त्रियों के रक्‍त की हानि होती है। ज्‍योतिष में इसे मंगल के ह्रास के रूप में देखा जाता है। मंगल के इस नुकसान की भरपाई के लिए सुहागिनों को लाल बिंदी लगाने, लाल चूडि़यां पहनने, लाल साड़ी एवं लाल रंग का सिंदूर लगाने की सलाह दी जाती है। मंगल की भूमिका अधिकार एवं तेज क रूप में होती है। लाल रंग को धारण करने से मंगल का तेज महिलाओं को फिर से प्राप्‍त हो सकता है। हालांकि लोकमान्‍यता में अधिकांशत: इसे सुहाग से जोड़ा जाता है, लेकिन ज्‍योतिषीय दृष्टिकोण से यह मंगल के नुकसान की भरपाई है। सामाजिक मान्‍यताओं में वैधव्‍य का दोष स्त्रियों को दिया जाता है। स्‍त्री के मांगलिक हो और उसका पति मांगलिक न हो तो ऐसा माना जाता है कि स्‍त्री हावी रहेगी और दांपत्‍य जीवन में तनाव रहेगा। अगर मंगल और शनि आठवें स्‍थान पर हो तो उसे चूंदड़ी मंगल कहा जाता है। ऐसी स्थिति में मंगल वैधव्‍य के योग बनाता है। कुण्‍डली मिलान में इसका बहुत ध्‍यान रखा जाता है। विधुर की तुलना में विधवा को पुरुष प्रधान समाज में अधिक समस्‍याओं को सामना करना पड़ सकता है। इसे देखते हुए कुण्‍डली मिलान के समय पुरुष की तुलना में स्‍त्री के मंगल पर अधिक ध्‍यान दिया जाता है।

बुध और शनि

बुध और शनि ग्रहों को नपुंसक ग्रह बताया गया है। पुरुष कुण्‍डली में जहां शनि पीड़ादायी ग्रह है वहीं स्‍त्री जातक के लिए बुध पीड़ादायी ग्रह सिद्ध होता है। बुध के प्रभाव में एक ही रूटीन में लंबे समय तक बने रहना और एक जैसी क्रियाओं को लगातार दोहराते रहना पुरुष के लिए आसान है, पर स्‍त्री जातकों के लिए यह पीड़ादायी सिद्ध होता है। ऐसे में महिलाओं को अपनी दिनचर्या, कपड़े, रहने का तौर तरीका लगातार बदलते रहने की सलाह दी जाती है। इससे उनकी जिंदगी में दुख और तकलीफ का असर कम होता है। परिधान की बात की जाए तो महिलाओं को परिधानों का रंग भी लगातार बदलना चाहिए। सोमवार क्रीम, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरा, गुरुवार को पीला, शुक्रवार को गुलाबी, शनिवार को नीला और रविवार को धूसर अथवा गहरा बैंगनी रंग पहनने की सलाह दी जाती है। यह प्रतिदिन का बदलाव उन्‍हें सभी ग्रहों के अनुकूल परिणाम दिलाता है।

चंद्रमा की भूमिका

जिस स्‍त्री जातक की कुण्‍डली में चंद्रमा अच्‍छी स्थिति में होता है, वे हंसमुख और रचनात्‍मक होती हैं। राहू, केतू, बुध और शनि के कारण चंद्रमा पीडि़त हो तो स्‍त्री कर्कशा, रुदन करने वाली या कलहप्रिय होती है। ऐसी स्त्रियों को रोजाना सुबह खाली पेट मिश्री के साथ मक्‍खन खाने की सलाह दी जाती है। चंद्रमा पीडि़त होने पर शरीर में खनिज तत्‍वों और कैल्शियम की कमी हो जाती है। मक्‍खन में उपलब्‍ध खनिज तत्‍व एवं कैल्शियम जातक के‍ केन्‍द्रीय तंत्रिका तंत्र को फिर से दुरुस्‍त करता है और जातक हंसने खिलखिलाने लगता है।

अंग लक्षण

स्‍त्री जातकों के अंग लक्षणों के बारे में अधिकांशत: वैवाहिक संदर्भ ही देखा जाता है। विवाह से संबंधित ग्रंथों में स्‍त्री के सुलक्षणी होने के कई सूत्र बताए गए हैं। इसके अनुसार भाग्‍यवान स्‍त्री के सिर के केश लंबे होने चाहिए, ललाट चौड़ा एवं उन्‍नत होना चाहिए। शरीर के अंगों पर बाल कम होने चाहिए। अधिक बालों वाली महिला को भाग्‍यहीन माना गया है। ऐसी स्‍त्री जातकों को अपने जीवन में अधिक संघर्ष देखना पड़ता है। सौभाग्‍यशाली कन्‍याओं की आंखों की पोरों में ललासी होनी चाहिए। हाथ और पैरों के नाखून चिकने और साफ सुथरे होने चाहिए, हथेलियां, पैरों के तलुए और एडी मुलायम एवं चिकने होने चाहिए। लोकमान्‍यता में गोरे रंग को तरजीह दी जाती है लेकिन सौभाग्‍यदायी अंग लक्षणों के संबंध में ललासी को तो महत्‍वपूर्ण माना गया है लेकिन कहीं त्‍वचा के रंग का उल्‍लेख नहीं मिलता है।

शारीरिक चिह्नों के आधार पर स्‍त्री को पुरुष के लक्षण अलग अलग बताए गए हैं। पुरुष की कुण्‍डली में जहां शंख, पद्म एवं चक्र जैसे चिह्न शरीर के दाएं अंग में शुभ बताए गए हैं, वहीं स्‍त्री जातक की कुण्‍डली में ये चिह्न बाएं अंग में शुभ माने गए हैं। स्‍त्री जातक के ललाट, आंख, गाल, कंधे, हाथ, वक्ष, उदर एवं पांव के बाएं भागों में तिल को शुभ माना गया है। अंगों की स्‍फुरण के मामले में भी स्‍त्री के बाएं अंगों में स्‍फुरण को शुभ बताया गया है। हस्‍तरेखा शास्‍त्र में ऐसा माना जाता है कि पुरुष का बायां हाथ उसे अपने पूर्व जन्‍मों के कर्मों के अनुसार मिला है, जबकि दायां हाथ इस जीवन के भाग्‍य और कर्म का लेखा जोखा रखता है, इसके उलट स्‍त्री जातक के बाएं हाथ को अधिक तरजीह दी जाती रही है। अब कुछ ज्‍योतिषी काम-काजी अथवा खुद निर्णय लेने वाली स्त्रियों के दाएं हाथ का निरीक्षण भी करने लगे हैं।